एस्तेर और मोर्दकै का सम्मान
हामान की सम्पत्ति एस्तेर को और उसकी मुहरवाली अँगूठी मोर्दकै को मिलती है, पर मृत्यु की आज्ञा रद्द नहीं की जा सकती। इसलिए राजकीय घोड़ों पर एक दूसरी आज्ञा निकलती है: यहूदी इकट्ठे होकर अपने प्राणों की रक्षा कर सकते हैं। मोर्दकै नीले और सुनहरे राजसी वस्त्र पहनकर निकलता है, और शूशन जयजयकार करता है।
8 1उसी दिन क्षयर्ष राजा ने यहूदियों के शत्रु हामान की संपत्ति एस्तेर रानी को दे दी। और मोर्दकै राजा के सामने आया, क्योंकि एस्तेर ने बता दिया था कि वह उसका कौन लगता है। 2तब राजा ने अपनी वह मुहर की अँगूठी, जो उसने हामान से वापस ले ली थी, उतारकर मोर्दकै को दे दी। और एस्तेर ने मोर्दकै को हामान की संपत्ति पर अधिकारी ठहराया।
3एस्तेर ने फिर राजा से बात की; वह उसके पाँवों पर गिर पड़ी, रोई, और उससे विनती की कि अगागी हामान की उस बुराई को और यहूदियों के विरुद्ध उसकी उस युक्ति को रोक दे। 4राजा ने एस्तेर की ओर सोने का राजदण्ड बढ़ाया, और एस्तेर उठकर राजा के सामने खड़ी हो गई। 5और कहने लगी, “यदि राजा को अच्छा लगे, यदि मुझ पर उसकी कृपादृष्टि हो, और यदि यह बात राजा को ठीक जान पड़े, और मैं उसकी दृष्टि में भाऊँ, तो ऐसी चिट्ठियाँ लिखी जाएँ जो उन चिट्ठियों को पलट दें जिन्हें अगागी हम्मदाता के पुत्र हामान ने राजा के सब प्रांतों में के यहूदियों को नष्ट करने की युक्ति करके लिखा था। 6क्योंकि मैं अपने लोगों पर पड़नेवाली विपत्ति को देखकर कैसे सह सकूँगी? मैं अपने कुल के नाश को देखकर कैसे सह सकूँगी?”
7तब क्षयर्ष राजा ने एस्तेर रानी और यहूदी मोर्दकै से कहा, “मैं ने हामान का घर एस्तेर को दे दिया है, और उसको लोगों ने फांसी के खंभे पर लटका दिया, क्योंकि उसने यहूदियों के विरुद्ध युक्ति की थी। 8अब तुम राजा के नाम से यहूदियों के विषय जैसा तुम्हें अच्छा लगे वैसा लिखो, और राजा की मुहर की अँगूठी से उस पर छाप लगा दो; क्योंकि जो चिट्ठी राजा के नाम से लिखी जाए और राजा की अँगूठी से छापी जाए वह पलटी नहीं जा सकती।”
9उसी समय, अर्थात तीसरे महीने जो सीवान कहलाता है, उसके तेईसवें दिन, राजा के लेखक बुलाए गए, और जो कुछ मोर्दकै ने आज्ञा दी वैसा ही यहूदियों के लिए, और भारत से लेकर कूश तक के एक सौ सत्ताईस प्रांतों के अधिपतियों, राज्यपालों और हाकिमों के लिए लिखा गया—हर एक प्रांत के लिए उसकी अपनी लिपि में, हर एक जाति के लिए उसकी अपनी भाषा में, और यहूदियों के लिए उनकी अपनी लिपि और भाषा में। 10उसने क्षयर्ष राजा के नाम से लिखकर राजा की मुहर की अँगूठी से उस पर छाप लगाई, और वे चिट्ठियाँ हरकारों के हाथ डाक के वेगवान घोड़ों पर, जो राजकाज के लिए पाले गए थे, भेज दीं। 11इन चिट्ठियों से राजा ने हर एक नगर के यहूदियों को यह अधिकार दिया कि वे इकट्ठे होकर अपने प्राणों की रक्षा करें; किसी जाति या प्रांत की जो हथियारबन्द सेना उन पर आक्रमण करे, उसे बालकों और स्त्रियों समेत नष्ट करें, घात करें और मिटा डालें, और उनका धन लूट लें; 12और यह सब क्षयर्ष राजा के सब प्रांतों में एक ही दिन, अर्थात बारहवें महीने अदार के तेरहवें दिन हो। 13इस आज्ञा की एक-एक नकल हर एक प्रांत में नियम करके दी जाए, और सब जातियों को प्रगट की जाए, कि यहूदी उस दिन अपने शत्रुओं से बदला लेने के लिए तैयार रहें। 14तब हरकारे राजकीय घोड़ों पर सवार होकर राजा की आज्ञा से फुर्ती करके और उतावली में दौड़ पड़े; और वह आज्ञा शूशन राजगढ़ में दी गई।
15मोर्दकै राजा के सामने से नीले और श्वेत राजकीय वस्त्र पहने, और सोने का एक बड़ा मुकुट धारण किए, और सूक्ष्म सन और बैंगनी रंग का बागा ओढ़े हुए निकला; और शूशन नगर के लोग जयजयकार करके आनन्दित हुए। 16यहूदियों को उजियाला, आनन्द, हर्ष और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। 17और जिस-जिस प्रांत और नगर में राजा की आज्ञा और नियम पहुँचे, वहाँ-वहाँ यहूदियों को आनन्द और हर्ष हुआ, और उन्होंने भोज किए और वह दिन आनन्दोत्सव का ठहराया। और उस देश की बहुत सी जातियों के लोग यहूदी बन गए, क्योंकि उनके मन में यहूदियों का भय समा गया था।