लूत अजनबियों का स्वागत करता है
लूत दो स्वर्गदूतों को शरण देता है, और सदोम के पुरुष उसके द्वार को घेर लेते हैं; वह अपनी बेटियों को उनके हवाले करने की पेशकश करता है। हमारे पिता की उस पर दया के कारण उसके परिवार को घसीटकर बाहर निकाला जाता है, फिर नगर जलता है, उसकी पत्नी रुकती है और नष्ट हो जाती है, और एक गुफा में उसकी बेटियाँ पुत्र पाने के लिए उसे नशे में धुत कर देती हैं।
19 1वे दोनों स्वर्गदूत उसी संध्या को सदोम पहुँचे; लूत सदोम के फाटक पर बैठा था। उन्हें देखकर वह उनसे मिलने को उठा और मुँह के बल भूमि तक झुककर प्रणाम किया। a a v1 मम्रे में इब्राहीम को दिखाई देने वाले तीनों में से केवल दो ही सदोम की ओर आगे बढ़े — हमारे परमपिता वहीं रुककर इब्राहीम के संग चलते रहे; इन दोनों स्वर्गदूतों ने न्याय को आगे बढ़ाया। 2उसने कहा, “हे मेरे प्रभुओ, कृपया अपने दास के घर पधारिए, रात यहीं बिताइए, अपने पाँव धोइए; और सवेरे उठकर अपने मार्ग पर चले जाइएगा।” उन्होंने कहा, “नहीं, हम तो चौक ही में रात बिताएँगे।”
3पर उसने उनसे बहुत आग्रह किया, तब वे उसके यहाँ मुड़कर उसके घर में आए। उसने उनके लिए भोज तैयार किया, बिना खमीर की रोटियाँ पकाईं, और उन्होंने खाया। 4इससे पहले कि वे लेटें, उस नगर के पुरुषों ने—अर्थात् सदोम के पुरुषों ने—क्या जवान क्या बूढ़ा, सारी प्रजा ने बिना किसी अपवाद के उस घर को घेर लिया। 5उन्होंने लूत को पुकारकर कहा, “वे पुरुष कहाँ हैं जो आज रात तेरे पास आए हैं? उन्हें बाहर हमारे पास ले आ, कि हम उनके साथ सहवास करें।”
6तब लूत द्वार पर उनके पास बाहर निकला और अपने पीछे का दरवाज़ा बन्द कर लिया, 7और बोला, “हे मेरे भाइयो, कृपया ऐसी बुराई मत करो। 8देखो, मेरी दो बेटियाँ हैं जो अब तक किसी पुरुष से नहीं मिलीं। उन्हें मैं तुम्हारे पास बाहर ले आता हूँ—उनसे जो तुम्हारा जी चाहे वही करो। पर इन पुरुषों से कुछ न करना; ये तो मेरी छत की शरण में आए हैं।”
9उन्होंने कहा, “पीछे हट!” फिर बोले, “यह परदेशी यहाँ रहने आया था, और अब हमारा न्यायी बन बैठा है? अब हम तेरे साथ उनसे भी बुरा व्यवहार करेंगे।” वे लूत पर बुरी तरह टूट पड़े और दरवाज़ा तोड़ने को आगे बढ़े। 10पर उन पुरुषों ने अपना हाथ बढ़ाकर लूत को अपने पास घर के भीतर खींच लिया और दरवाज़ा बन्द कर दिया। 11और घर के द्वार पर जो पुरुष थे उन्हें क्या छोटे क्या बड़े, सब को अंधा कर दिया, यहाँ तक कि वे द्वार ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गए।
12फिर उन पुरुषों ने लूत से कहा, “यहाँ तेरा और कौन-कौन है—दामाद, बेटे, बेटियाँ, अथवा इस नगर में जो कोई तेरा हो? उन सब को इस स्थान से बाहर ले जा। 13क्योंकि हम इस स्थान का नाश करने पर हैं—इसके निवासियों के विरुद्ध की दुहाई हमारे परमपिता के सामने बहुत बढ़ गई है, और हमारे परमपिता ने हमें इसका नाश करने को भेजा है।”
14तब लूत बाहर गया और अपने दामादों से, जो उसकी बेटियों के वाग्दत्त थे, बोला, “उठो, इस स्थान से निकल चलो—हमारे परमपिता इस नगर का नाश करने पर हैं!” पर उसके दामादों ने इसे हँसी-ठट्ठा समझा।
15पौ फटते ही स्वर्गदूतों ने लूत को उतावला करते हुए कहा, “उठ, अपनी पत्नी और यहाँ की अपनी दोनों बेटियों को ले, नहीं तो तू नगर के दण्ड में नष्ट हो जाएगा।” 16जब वह विलम्ब कर रहा था, तब उन पुरुषों ने उसका, उसकी पत्नी का, और उसकी दोनों बेटियों का हाथ पकड़ लिया, क्योंकि हमारे परमपिता ने उस पर तरस खाया; और वे उसे बाहर ले जाकर नगर के बाहर छोड़ आए। 17जब वे उन्हें बाहर ले आए, तो उनमें से एक ने कहा, “अपने प्राण बचाकर भाग! पीछे मुड़कर मत देखना और न इस तराई में कहीं ठहरना। पहाड़ पर भाग जा, नहीं तो तू भी बह जाएगा।”
18पर लूत ने उनसे कहा, “हे मेरे प्रभु परमपिता, ऐसा न हो। 19देख, तेरे दास पर तेरी अनुग्रह-दृष्टि हुई है; मेरे प्राण बचाकर तूने मुझ पर बड़ी करुणा की है। पर मैं पहाड़ पर नहीं भाग सकता—कहीं विपत्ति मुझे आ पकड़े और मैं मर जाऊँ। 20देख, वह नगर पास है, इतना छोटा कि वहाँ भाग जाऊँ। मुझे वहीं बचने दे—क्या वह छोटा-सा नहीं?—कि मेरा प्राण बचे।”
21उसने उससे कहा, “देख, मैं तेरी यह विनती भी मान लेता हूँ: जिस नगर की तूने चर्चा की उसे मैं नष्ट न करूँगा। 22फुर्ती कर, वहीं भाग जा—क्योंकि जब तक तू वहाँ न पहुँचे, मैं कुछ नहीं कर सकता।” इसी कारण उस नगर का नाम सोअर पड़ा। b b v22 सोअर का अर्थ है “छोटा” — लूत ने उस नगर का नाम अपनी ही विनती के अनुसार रखा कि वह तो “छोटा-सा ही” है।
23जब लूत सोअर पहुँचा, तब सूर्य पृथ्वी पर उदय हो चुका था। 24तब हमारे परमपिता ने आकाश में से सदोम और गमोरा पर गन्धक और आग बरसाई। c c v24 कुछ मसीही पाठकों ने इस पद के दोहरे नामकरण में त्रित्व के दो व्यक्तियों को सुना है, पर FHB एक ही को सुनता है — हमारे परमपिता को, जिनका न्याय उन्हीं के सिंहासन से आता है। 25उसने उन नगरों को, समस्त तराई को, उन नगरों के सब निवासियों को, और भूमि पर उगने वाली हर वस्तु को नष्ट कर दिया। 26पर लूत की पत्नी ने उसके पीछे से मुड़कर देखा, और वह नमक का खम्भा बन गई।
27दूसरे दिन बड़े सवेरे इब्राहीम उस स्थान को गया जहाँ वह हमारे परमपिता के सामने खड़ा हुआ था। 28उसने सदोम, गमोरा और समस्त तराई की ओर दृष्टि की, और क्या देखा कि उस देश में से धुआँ भट्ठे के धुएँ के समान उठ रहा है।
29जब हमारे परमपिता ने उस तराई के नगरों को नष्ट किया, तब हमारे परमपिता ने इब्राहीम को स्मरण किया और लूत को उन नगरों के उलट-पुलट में से बाहर निकाल लिया, जहाँ लूत बसा हुआ था।
गुफा में लूत
30फिर लूत सोअर से चढ़कर अपनी दोनों बेटियों समेत पहाड़ पर रहने लगा, क्योंकि वह सोअर में रहने से डरता था; इसलिए वह और उसकी दोनों बेटियाँ एक गुफा में रहने लगे। 31तब बड़ी बेटी ने छोटी से कहा, “हमारा पिता बूढ़ा है; और इस देश में कोई पुरुष नहीं रहा जो संसार की रीति के अनुसार हमारे पास आए। 32आ, हम अपने पिता को दाखमधु पिलाएँ, फिर उसके साथ सोएँ, कि अपने पिता से वंश बनाए रखें।” 33उसी रात उन्होंने अपने पिता को दाखमधु पिलाया; और बड़ी बेटी भीतर जाकर अपने पिता के साथ लेटी। उसे न मालूम हुआ कि वह कब लेटी और कब उठी। 34दूसरे दिन बड़ी ने छोटी से कहा, “देख, बीती रात मैं अपने पिता के साथ सोई। आज रात भी हम उसे दाखमधु पिलाएँ—तू जाकर उसके साथ सो, कि हम अपने पिता से वंश बनाए रखें।” 35उस रात भी उन्होंने अपने पिता को दाखमधु पिलाया; और छोटी उठकर उसके साथ सोई, और उसे न मालूम हुआ कि वह कब लेटी और कब उठी। 36इस प्रकार लूत की दोनों बेटियाँ अपने पिता से गर्भवती हुईं। 37बड़ी ने एक पुत्र जना और उसका नाम मोआब रखा—वही आज तक के मोआबियों का पिता है। 38छोटी के भी एक पुत्र हुआ और उसने उसका नाम बेनम्मी रखा—वही आज तक के अम्मोनियों का पिता है।