आदि में, वचन
सबसे आत्मीय सुसमाचार, जो इसलिए लिखा गया कि तुम विश्वास करो कि यीशु परमेश्वर के पुत्र हैं और उनके नाम में जीवन पाओ। इसमें उनके “मैं हूँ” वचन और पिता के विषय में उनकी विदाई-शिक्षा दर्ज हैं।
1 1आदि में वचन था, और वचन हमारे परमपिता के साथ था, और वचन परमेश्वर था। 2यही आदि में हमारे परमपिता के साथ था। 3सब कुछ उसी के द्वारा रचा गया, और जो कुछ रचा गया है उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना नहीं रची गई। 4उसमें जीवन था, और वह जीवन सब मनुष्यों की ज्योति था। 5ज्योति अंधकार में चमकती है, और अंधकार ने उस पर विजय नहीं पाई।
6हमारे परमपिता की ओर से भेजा हुआ एक मनुष्य आया, जिसका नाम यूहन्ना था। 7वह गवाही के लिये आया, कि ज्योति के विषय में गवाही दे, ताकि सब उसकी गवाही के द्वारा विश्वास करें। 8वह स्वयं वह ज्योति न था, परन्तु ज्योति के विषय में गवाही देने आया था। 9सच्ची ज्योति, जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आने वाली थी। 10वह जगत में था। जगत उसी के द्वारा रचा गया, फिर भी जगत ने उसे न पहचाना। 11वह अपने घर आया, और उसके अपने ही लोगों ने उसे ग्रहण न किया। 12परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, और उसके नाम पर विश्वास किया, उसने उन्हें हमारे परमपिता की सन्तान बनने का अधिकार दिया, a a v12 जो यीशु को ग्रहण करते हैं, उन्हें हमारे परमपिता की सन्तान बनने का अधिकार दिया जाता है — उसी के परिवार में लौटाया जाता है जिसने अपने पुत्र को भेजा। 13ये न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु हमारे परमपिता से जन्मे।
14वचन देहधारी हुआ, और हमारे बीच में वास किया। हमने उसकी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते पुत्र की महिमा, जो अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण थी। 15यूहन्ना ने उसके विषय में गवाही दी, और पुकारकर कहा, “यह वही है जिसकी मैंने चर्चा की थी: जो मेरे बाद आता है वह मुझसे बड़ा है, क्योंकि वह मुझसे पहले था।” 16क्योंकि उसकी परिपूर्णता में से हम सब ने अनुग्रह पर अनुग्रह पाया। 17क्योंकि व्यवस्था तो मूसा के द्वारा दी गई, परन्तु अनुग्रह और सत्य यीशु मसीह के द्वारा आया। 18हमारे परमपिता को किसी ने कभी नहीं देखा; एकलौता पुत्र, जो पिता की गोद में है, उसी ने उसे प्रगट किया। b b v18 केवल वही पुत्र, जो सदा हमारे परमपिता के हृदय के निकट रहा है, हमें दिखा सकता है कि हमारे परमपिता सचमुच कौन हैं — पिता की हर एक झलक यीशु के द्वारा आती है।
यूहन्ना, तुम कौन हो?
19यूहन्ना की गवाही यह है, जब यहूदियों ने यरूशलेम से याजकों और लेवियों को उससे यह पूछने भेजा, “तू कौन है?” 20उसने स्वीकार किया, और इन्कार न किया, परन्तु मान लिया, “मैं मसीह नहीं हूँ।”
21तब उन्होंने उससे पूछा, “तो फिर क्या तू एलिय्याह है?” उसने कहा, “मैं नहीं हूँ।” “क्या तू वह भविष्यद्वक्ता है?” उसने उत्तर दिया, “नहीं।”
22तब उन्होंने पूछा, “तू कौन है? हमें भेजने वालों को हमें उत्तर देना है। तू अपने विषय में क्या कहता है?”
23उसने कहा, “जैसा भविष्यद्वक्ता यशायाह ने कहा था, मैं ‘जंगल में एक पुकारने वाले का शब्द हूँ, प्रभु का मार्ग सीधा करो।’”
24जो भेजे गए थे वे फरीसियों की ओर से थे। 25उन्होंने उससे पूछा, “यदि तू न मसीह है, न एलिय्याह, और न वह भविष्यद्वक्ता, तो फिर तू बपतिस्मा क्यों देता है?”
26यूहन्ना ने उन्हें उत्तर दिया, “मैं तो जल से बपतिस्मा देता हूँ, परन्तु तुम्हारे बीच में एक व्यक्ति खड़ा है जिसे तुम नहीं जानते, 27वही जो मेरे बाद आता है, जिसके जूते का बन्ध खोलने के मैं योग्य नहीं।” 28ये बातें यरदन के पार बैतनिय्याह में हुईं, जहाँ यूहन्ना बपतिस्मा देता था।
देखो, वह मेम्ना
29दूसरे दिन उसने यीशु को अपनी ओर आते देखकर कहा, “देखो! हमारे परमपिता का मेम्ना—यीशु—जो जगत का पाप उठा ले जाता है! c c v29 यूहन्ना यीशु को “हमारे परमपिता का मेम्ना” कहता है, क्योंकि यह पिता ही है जो मेम्ना जुटाता है — वही पिता जिसने अब्राहम से प्रतिज्ञा की थी कि ‘परमेश्वर आप ही अपने लिये मेम्ना जुटाएगा,’ अब उस प्रतिज्ञा को अपने ही पुत्र में पूरा करता है। 30यह वही है जिसकी मैंने चर्चा की थी: ‘मेरे बाद एक व्यक्ति आता है जो मुझसे बड़ा है, क्योंकि वह मुझसे पहले था।’ 31मैं तो उसे नहीं जानता था, परन्तु इसलिये जल से बपतिस्मा देता आया कि वह इस्राएल पर प्रगट हो जाए।” 32यूहन्ना ने गवाही दी: “मैंने पवित्र आत्मा को कबूतर के समान स्वर्ग से उतरते और उस पर ठहरते देखा। 33मैं तो उसे नहीं जानता था, परन्तु जिसने मुझे जल से बपतिस्मा देने भेजा, उसी ने मुझसे कहा, ‘जिस पर तू पवित्र आत्मा को उतरते और ठहरते देखे, वही है जो पवित्र आत्मा से बपतिस्मा देता है।’ 34और मैंने देखा है, और गवाही दी है कि यही हमारे परमपिता का पुत्र है।” d d v34 यूहन्ना की गवाही यीशु को हमारे परमपिता का पुत्र कहती है — केवल ‘परमेश्वर का एक पुत्र’ नहीं, परन्तु वह अनन्त पुत्र जिससे पिता ने जगत की उत्पत्ति से पहले से प्रेम रखा है।
आओ और देखो
35दूसरे दिन फिर यूहन्ना अपने दो चेलों के साथ खड़ा था, 36और यीशु को चलते हुए देखकर कहा, “देखो! हमारे परमपिता का मेम्ना!” 37उन दोनों चेलों ने उसे यह कहते सुना, और वे यीशु के पीछे हो लिए।
38यीशु ने मुड़कर उन्हें पीछे आते देखा, और उनसे पूछा, “तुम क्या ढूँढ़ते हो?” उन्होंने कहा, “रब्बी” (अर्थात् गुरु), “आप कहाँ रहते हैं?”
39उसने उनसे कहा, “आओ और देखोगे।” तब वे गए और देखा कि वह कहाँ रहता है, और उस दिन उसी के साथ रहे—लगभग दिन के चौथे पहर।
40उन दोनों में से एक, जो यूहन्ना की बात सुनकर यीशु के पीछे हो लिया था, शमौन पतरस का भाई अन्द्रियास था। 41उसने पहले अपने सगे भाई शमौन को पाकर उससे कहा, “हमने मसीहा को पा लिया है” (अर्थात् मसीह)।
42वह उसे यीशु के पास लाया। यीशु ने उस पर दृष्टि करके कहा, “तू यूहन्ना का पुत्र शमौन है। तू कैफा कहलाएगा” (अर्थात् पतरस)।
43दूसरे दिन यीशु ने गलील को जाने का निश्चय किया। उसने फिलिप्पुस को पाकर कहा, “मेरे पीछे हो ले।”
44फिलिप्पुस बैतसैदा का था, जो अन्द्रियास और पतरस का नगर था। 45फिलिप्पुस ने नतनएल को पाकर उससे कहा, “जिसके विषय में मूसा ने व्यवस्था में और भविष्यद्वक्ताओं ने लिखा है, उसे हमने पा लिया है—यीशु, यूसुफ का पुत्र, नासरत का।”
46नतनएल ने कहा, “क्या नासरत से कोई अच्छी वस्तु निकल सकती है?” फिलिप्पुस ने कहा, “आओ और देखो।”
47यीशु ने नतनएल को अपनी ओर आते देखकर उसके विषय में कहा, “देखो—यह सचमुच का इस्राएली है, जिसमें कोई छल नहीं!”
48नतनएल ने उससे पूछा, “तू मुझे कैसे जानता है?” यीशु ने उत्तर दिया, “इससे पहले कि फिलिप्पुस तुझे बुलाता, जब तू अंजीर के पेड़ के नीचे था, मैंने तुझे देखा।”
49नतनएल ने उसे उत्तर दिया, “हे रब्बी, तू हमारे परमपिता का पुत्र है! तू इस्राएल का राजा है!”
50यीशु ने उसे उत्तर दिया, “मैंने तुझसे कहा कि मैंने तुझे अंजीर के पेड़ के नीचे देखा, इसलिये तू विश्वास करता है? तू इनसे भी बड़ी बातें देखेगा।” 51उसने उससे कहा, “मैं तुमसे सच सच कहता हूँ, तुम स्वर्ग को खुला हुआ, और हमारे परमपिता के स्वर्गदूतों को मनुष्य के पुत्र पर चढ़ते-उतरते देखोगे।” e e v51 यीशु बेतेल में याकूब के दर्शन (उत्प. 28:12) की ओर संकेत करता है, जहाँ स्वर्गदूत एक सीढ़ी पर स्वर्ग और पृथ्वी के बीच आते-जाते थे — अब वह उसी में पूरा हुआ।