सामरिया से होकर मार्ग
याकूब के कुएँ पर थके हुए यीशु एक सामरी स्त्री से पानी माँगते हैं, उसके पाँच पतियों का सच खोल देते हैं, और ऐसा जल देते हैं जो उसके भीतर सोता बन जाता है। पिता आत्मा और सच्चाई से आराधना करनेवालों को ढूँढ़ रहे हैं। उसका पूरा नगर विश्वास करता है; मरने पर पड़ा एक लड़का जीवित रहता है।
4 1इसलिए जब यीशु ने जान लिया कि फरीसियों ने सुना है कि वह यूहन्ना से अधिक चेले बना रहा और बपतिस्मा दे रहा है 2(यद्यपि यीशु स्वयं बपतिस्मा नहीं देता था, परन्तु उसके चेले देते थे), 3तब वह यहूदिया को छोड़कर फिर गलील को चला गया। 4और उसे सामरिया से होकर जाना पड़ा। 5अतः वह सामरिया के एक नगर में आया, जो सूखार कहलाता है, उस भूमि के निकट जो याकूब ने अपने पुत्र यूसुफ को दी थी। 6वहाँ याकूब का कुआँ था। यीशु यात्रा से थका हुआ उस कुएँ पर यों ही बैठ गया—लगभग दोपहर का समय था। a a v6 सूर्योदय से गिनने पर छठा घंटा लगभग दोपहर का होता है।
7सामरिया की एक स्त्री जल भरने आई। यीशु ने उससे कहा, “मुझे पानी पिला।”
8(क्योंकि उसके चेले भोजन मोल लेने नगर में गए हुए थे।)
9उस सामरी स्त्री ने कहा, “तू तो यहूदी है; फिर मुझ सामरी स्त्री से पानी क्यों माँगता है?” (क्योंकि यहूदी सामरियों से मेलजोल नहीं रखते।)
10यीशु ने उत्तर देकर उससे कहा, “यदि तू हमारे परमपिता के दान को जानती, और यह भी कि वह कौन है जो तुझसे कहता है, ‘मुझे पानी पिला,’ तो तू उससे माँगती, और वह तुझे जीवन का जल देता।”
11स्त्री ने उससे कहा, “हे प्रभु, तेरे पास तो पानी भरने को कुछ भी नहीं, और कुआँ गहरा है। फिर तेरे पास वह जीवन का जल कहाँ से आया? 12क्या तू हमारे पिता याकूब से बड़ा है, जिसने हमें यह कुआँ दिया, और आप अपने पुत्रों तथा पशुओं समेत इसी में से पीता था?”
13यीशु ने उससे कहा, “जो कोई यह पानी पीता है वह फिर प्यासा होगा, 14परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा वह फिर कभी प्यासा न होगा; वरन जो जल मैं उसे दूँगा वह उसमें एक स्रोत बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।”
15स्त्री ने उससे कहा, “हे प्रभु, वह जल मुझे दे, ताकि मैं न प्यासी होऊँ और न यहाँ जल भरने आऊँ।”
16यीशु ने उससे कहा, “जा, अपने पति को बुला ला, और यहाँ लौट आ।”
17स्त्री ने उत्तर दिया, “मेरा तो कोई पति नहीं।” यीशु ने उससे कहा, “तूने ठीक कहा कि मेरा कोई पति नहीं;
18क्योंकि तेरे पाँच पति हो चुके हैं, और जो अब तेरे पास है वह तेरा पति नहीं। यह तूने सच कहा।”
19स्त्री ने उससे कहा, “हे प्रभु, मुझे दिखाई देता है कि तू भविष्यद्वक्ता है। 20हमारे पूर्वजों ने इस पहाड़ पर आराधना की, परन्तु तुम कहते हो कि जहाँ आराधना करनी चाहिए वह स्थान यरूशलेम में है।”
21यीशु ने उससे कहा, “हे नारी, मेरी बात पर विश्वास कर: वह समय आता है जब तुम परमपिता की आराधना न तो इस पहाड़ पर करोगे और न यरूशलेम में। 22तुम उसकी आराधना करते हो जिसे तुम नहीं जानते; हम उसकी आराधना करते हैं जिसे हम जानते हैं—क्योंकि उद्धार यहूदियों में से है। 23परन्तु वह समय आता है, वरन अब है, जब सच्चे आराधक परमपिता की आराधना आत्मा और सच्चाई से करेंगे—क्योंकि परमपिता अपने लिये ऐसे ही आराधक ढूँढ़ता है। 24परमपिता आत्मा है, और अवश्य है कि उसके आराधक आत्मा और सच्चाई से आराधना करें।” b b v24 इस पूरे प्रसंग में यीशु परमपिता की आराधना के विषय में सिखाता है; जिसका स्वभाव आत्मा है वही परमपिता है जो सच्चे आराधकों को ढूँढ़ता है।
25स्त्री ने उससे कहा, “मैं जानती हूँ कि मसीहा—जो मसीह कहलाता है—आनेवाला है। जब वह आएगा, तब हमें सब कुछ बता देगा।”
26यीशु ने उससे कहा, “मैं ही वह हूँ—जो तुझसे बोल रहा है।”
27इसी बीच उसके चेले लौट आए, और अचम्भा करने लगे कि वह एक स्त्री से बातें कर रहा है। तौभी किसी ने न कहा, “तू क्या चाहता है?” या, “उससे क्यों बात करता है?” 28तब वह स्त्री अपना घड़ा वहीं छोड़कर नगर में लौट गई और लोगों से कहने लगी, 29“आओ, एक मनुष्य को देखो जिसने मुझे वह सब कुछ बता दिया जो मैंने कभी किया। कहीं यही तो मसीह नहीं?” 30वे नगर से निकलकर उसके पास आने लगे।
31इसी बीच चेले उससे यह कहकर विनती कर रहे थे, “हे रब्बी, कुछ खा ले।”
32परन्तु उसने उनसे कहा, “मेरे पास खाने के लिये ऐसा भोजन है जिसे तुम नहीं जानते।”
33इसलिए चेले आपस में कहने लगे, “क्या कोई उसके लिये कुछ खाने को लाया है?”
34यीशु ने उनसे कहा, “मेरा भोजन यही है कि अपने भेजनेवाले की इच्छा पूरी करूँ और उसका काम पूरा करूँ। 35क्या तुम नहीं कहते, ‘अभी चार महीने और हैं, तब कटनी आएगी’? देखो, मैं तुमसे कहता हूँ: अपनी आँखें उठाओ और खेतों को देखो—वे कटनी के लिये पक चुके हैं। 36काटनेवाला तो अभी से मजदूरी पाता, और अनन्त जीवन के लिये फल बटोरता है, ताकि बोनेवाला और काटनेवाला दोनों मिलकर आनन्द करें। 37क्योंकि इसमें यह कहावत ठीक ठहरती है: ‘बोता कोई और है, और काटता कोई और।’ 38मैंने तुम्हें वह काटने के लिये भेजा जिसके लिये तुमने परिश्रम नहीं किया। औरों ने परिश्रम किया, और तुम उनके परिश्रम में सहभागी हुए।”
सामरिया विश्वास करता है
39उस नगर के बहुत से सामरियों ने उस स्त्री की इस गवाही के कारण उस पर विश्वास किया: “उसने मुझे वह सब कुछ बता दिया जो मैंने कभी किया।” 40अतः जब वे सामरी उसके पास आए, तो उससे विनती करने लगे कि उनके साथ रह जाए; और वह वहाँ दो दिन रहा। 41और उसके वचन के कारण और भी बहुत से लोगों ने विश्वास किया। 42उन्होंने उस स्त्री से कहा, “अब हम केवल तेरे कहने से विश्वास नहीं करते—हमने आप ही सुन लिया, और जान लिया कि सचमुच यही जगत का उद्धारकर्ता है।”
गलील को वापसी
43उन दो दिनों के बाद वह वहाँ से गलील को चल दिया। 44(क्योंकि यीशु ने स्वयं गवाही दी थी कि भविष्यद्वक्ता का अपने ही नगर में आदर नहीं होता।) 45जब वह गलील में पहुँचा, तो गलीलियों ने उसका स्वागत किया, क्योंकि उन्होंने वह सब कुछ देखा था जो उसने यरूशलेम में पर्व के समय किया था—वे भी तो पर्व में गए हुए थे। 46वह फिर गलील के काना में आया, जहाँ उसने पानी से दाखरस बनाया था। कफरनहूम में एक राजकर्मचारी का पुत्र बीमार था। 47यह सुनकर कि यीशु यहूदिया से गलील आ गया है, वह उसके पास गया और उससे विनती करने लगा कि आकर उसके पुत्र को चंगा करे, क्योंकि वह मरने पर था।
48तब यीशु ने उससे कहा, “जब तक तुम लोग चिन्ह और अद्भुत काम न देखो, तब तक कभी विश्वास न करोगे।”
49उस राजकर्मचारी ने उससे कहा, “हे प्रभु, मेरे बालक के मरने से पहले चल।”
50यीशु ने उससे कहा, “जा; तेरा पुत्र जीवित है।” उस मनुष्य ने उस बात पर विश्वास किया जो यीशु ने उससे कही, और चला गया।
51वह जा ही रहा था कि उसके दास उससे आ मिले और बताया कि उसका लड़का जीवित है। 52तब उसने उनसे पूछा कि वह किस घड़ी सुधरने लगा, और उन्होंने कहा, “कल सातवें घंटे में उसका ज्वर उतर गया।”
53तब पिता ने जान लिया कि यह ठीक वही घड़ी थी जब यीशु ने उससे कहा था, “तेरा पुत्र जीवित है।” और उसने तथा उसके सारे घराने ने विश्वास किया।
54यह दूसरा चिन्ह था जो यीशु ने यहूदिया से गलील आकर दिखाया।