जन्म से अंधा मनुष्य
जन्म से अंधे एक मनुष्य की आँखों पर मिट्टी लगाई जाती है, वह धोता है और देखने लगता है, और यूँ हमारे पिता के काम उसमें प्रकट होते हैं। दो बार पूछताछ होने पर भी वह अपनी बात से नहीं डिगता: वह अंधा था, अब देखता है। आराधनालय उसे निकाल देता है, यीशु उसे ढूँढ़ लेते हैं, और अपनी दृष्टि पर भरोसा रखनेवाले ही अंधे ठहरते हैं।
9 1जब यीशु जा रहे थे, तो उन्होंने एक ऐसे मनुष्य को देखा जो जन्म से अंधा था। 2उनके चेलों ने उनसे पूछा, “हे रब्बी, किसने पाप किया, इस मनुष्य ने या इसके माता-पिता ने, कि यह जन्म से अंधा हुआ?”
3यीशु ने उत्तर दिया, “न तो इस मनुष्य ने पाप किया और न इसके माता-पिता ने, परन्तु यह इसलिए हुआ कि हमारे परमपिता के काम इसमें प्रकट हों। a a v3 यीशु इस मनुष्य के अंधेपन को पाप का दंड मानने से इन्कार करते हैं। इसके बजाय वे हमारे परमपिता की ओर संकेत करते हैं, जिनका उद्धार का काम ठीक उसी जगह प्रकट होगा जहाँ संसार ने केवल असफलता देखी थी। 4जब तक दिन है, हमें उसके काम करने चाहिए जिसने मुझे भेजा है; रात आती है, जब कोई काम नहीं कर सकता। 5जब तक मैं संसार में हूँ, तब तक मैं संसार की ज्योति हूँ।”
6यह कहकर उन्होंने भूमि पर थूका, और थूक से मिट्टी सानी, और वह मिट्टी उस मनुष्य की आँखों पर लगा दी।
7और उससे कहा, “जा, शीलोह के कुंड में धो ले” (जिसका अर्थ है ‘भेजा हुआ’)। सो वह मनुष्य गया, धोया, और देखता हुआ लौट आया।
8तब पड़ोसी और जिन्होंने उसे पहले भीख माँगते देखा था, कहने लगे, “क्या यह वही नहीं जो बैठकर भीख माँगा करता था?” 9कुछ ने कहा, “यह वही है।” औरों ने कहा, “नहीं, यह तो केवल उसके जैसा दिखता है।” वह कहता रहा, “मैं वही हूँ।”
10तब उन्होंने उससे पूछा, “फिर तेरी आँखें कैसे खुल गईं?”
11उसने उत्तर दिया, “उस मनुष्य ने, जिसका नाम यीशु है, मिट्टी सानी, और मेरी आँखों पर लगाई, और मुझसे कहा, ‘शीलोह में जाकर धो ले।’ सो मैं गया, धोया, और देखने लगा।”
12उन्होंने उससे कहा, “वह कहाँ है?” उसने कहा, “मैं नहीं जानता।”
13वे उस मनुष्य को, जो पहले अंधा था, फरीसियों के पास ले गए। 14जिस दिन यीशु ने मिट्टी सानकर उसकी आँखें खोली थीं, वह सब्त का दिन था। 15सो फरीसियों ने भी उससे फिर पूछा कि उसने कैसे दृष्टि पाई। उसने उनसे कहा, “उसने मेरी आँखों पर मिट्टी लगाई, और मैंने धोया, और अब मैं देखता हूँ।”
16कुछ फरीसियों ने कहा, “यह मनुष्य परमेश्वर की ओर से नहीं है—यह सब्त नहीं मानता।” औरों ने कहा, “एक पापी मनुष्य ऐसे चिन्ह कैसे दिखा सकता है?” सो उनमें फूट पड़ गई।
17उन्होंने फिर उस अंधे मनुष्य से पूछा, “तू उसके विषय में क्या कहता है, क्योंकि उसने तेरी आँखें खोली हैं?” उसने कहा, “वह एक भविष्यद्वक्ता है।”
18यहूदियों ने विश्वास न किया कि वह अंधा था और उसने दृष्टि पाई है, जब तक कि उन्होंने उस मनुष्य के माता-पिता को न बुलाया जिसने दृष्टि पाई थी। 19उन्होंने उनसे पूछा, “क्या यह तुम्हारा पुत्र है, जिसके विषय में तुम कहते हो कि यह जन्म से अंधा था? तो अब यह कैसे देखता है?”
20उसके माता-पिता ने उत्तर दिया, “हम जानते हैं कि यह हमारा पुत्र है और यह जन्म से अंधा था। 21परन्तु अब यह कैसे देखता है, यह हम नहीं जानते; या किसने इसकी आँखें खोलीं, यह भी हम नहीं जानते। इसी से पूछ लो—यह बालिग है; यह अपने विषय में स्वयं कह देगा।” 22उसके माता-पिता ने यह इसलिए कहा क्योंकि वे यहूदियों से डरते थे, क्योंकि यहूदी पहले ही ठान चुके थे कि यदि कोई यीशु को मसीह मान ले, तो उसे आराधनालय से निकाल दिया जाए। b b v22 आराधनालय से निकाला जाना यहूदी समुदाय से पूर्ण सामाजिक और धार्मिक बहिष्कार को दर्शाता था। 23इसी कारण उसके माता-पिता ने कहा, “यह बालिग है; इसी से पूछ लो।”
24सो उन्होंने उस मनुष्य को, जो पहले अंधा था, फिर बुलाया और कहा, “परमेश्वर की महिमा कर। हम जानते हैं कि यह मनुष्य पापी है।”
25उसने उत्तर दिया, “वह पापी है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। एक बात मैं जानता हूँ: मैं अंधा था, अब देखता हूँ।”
26उन्होंने उससे कहा, “उसने तेरे साथ क्या किया? उसने तेरी आँखें कैसे खोलीं?”
27उसने उन्हें उत्तर दिया, “मैं तो तुम्हें पहले ही बता चुका, और तुमने न सुना। तुम इसे फिर क्यों सुनना चाहते हो? क्या तुम भी उसके चेले बनना चाहते हो?”
28और उन्होंने उसकी निंदा करके कहा, “तू ही उसका चेला है, परन्तु हम तो मूसा के चेले हैं। 29हम जानते हैं कि परमेश्वर ने मूसा से बातें कीं, परन्तु इस मनुष्य के विषय में हम नहीं जानते कि वह कहाँ का है।”
30उस मनुष्य ने उन्हें उत्तर दिया, “यही तो अचम्भे की बात है: तुम नहीं जानते कि वह कहाँ का है, फिर भी उसने मेरी आँखें खोलीं। 31हम जानते हैं कि परमेश्वर पापियों की नहीं सुनता, परन्तु यदि कोई परमेश्वर का भय मानता और उसकी इच्छा पर चलता है, तो वह उसकी सुनता है। 32जगत की उत्पत्ति से लेकर आज तक यह कभी नहीं सुना गया कि किसी ने जन्म से अंधे मनुष्य की आँखें खोली हों। 33यदि यह मनुष्य परमेश्वर की ओर से न होता, तो कुछ भी न कर सकता।”
34उन्होंने उसे उत्तर दिया, “तू तो सर्वथा पाप में जन्मा है, और तू हमें सिखाता है?” और उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया।
क्या तुम विश्वास करते हो?
35यीशु ने सुना कि उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया है, और उसे पाकर कहा, “क्या तू मनुष्य के पुत्र पर विश्वास करता है?”
36उसने उत्तर दिया, “हे प्रभु, वह कौन है, कि मैं उस पर विश्वास करूँ?”
37यीशु ने उससे कहा, “तूने उसे देखा है, और जो तुझसे बातें कर रहा है, वही है।”
38उसने कहा, “हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ,” और उसने उन्हें दण्डवत् किया।
39यीशु ने कहा, “मैं इस जगत में न्याय के लिए आया हूँ, ताकि जो नहीं देखते वे देखें, और जो देखते हैं वे अंधे हो जाएँ।”
40कुछ फरीसी जो उनके साथ थे, यह सुनकर बोले, “क्या हम भी अंधे हैं?”
41यीशु ने उनसे कहा, “यदि तुम अंधे होते, तो तुम में पाप न होता; परन्तु अब तुम कहते हो, ‘हम देखते हैं,’ इसलिए तुम्हारा पाप बना रहता है।”