दो मार्ग, दो गंतव्य
हमारे पिता के लोगों की प्रार्थना-पुस्तक और गीत-पुस्तक—एक सौ पचास भजन, स्तुति, विलाप, धन्यवाद और भरोसे के, जो मानव हृदय की हर ऋतु में फैले हुए हैं और ईमानदारी से हमारे पिता के सामने लाए गए हैं।
1 1धन्य है वह मनुष्य जो दुष्टों की सम्मति पर नहीं चलता, न पापियों के बीच खड़ा होता है, और न ठट्ठा करनेवालों की मण्डली में बैठता है, 2परन्तु उसका आनन्द हमारे परमपिता की व्यवस्था में है, और वह दिन-रात उसी की व्यवस्था पर ध्यान करता रहता है। 3वह उस वृक्ष के समान है जो जल की धाराओं के किनारे लगाया गया हो, जो अपनी ऋतु में फल लाता है, और जिसका पत्ता कभी मुरझाता नहीं—और जो कुछ वह करता है उसमें सफल होता है।
4दुष्टों की दशा ऐसी नहीं! वे तो उस भूसी के समान हैं जिसे पवन उड़ा ले जाती है। 5इसलिए दुष्ट न्याय में स्थिर न रह सकेंगे, और न पापी धर्मियों की मण्डली में। 6क्योंकि हमारे परमपिता धर्मियों के मार्ग की देखभाल करते हैं, परन्तु दुष्टों का मार्ग नाश हो जाएगा।